विश्व वंदनीय युगपुरुष महात्मा गांधी

     


 अक्टूबर मास में विश्व वंदनीय युगपुरुष महात्मा गांधी और अखंड भारत के शिल्पी लोह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे महान विभूति और  श्यामजी कृष्ण वर्मा , लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान व्यक्तियों की जन्म तिथि और पूर्ण तिथि के शुभ अवसर पर हम उन महान पुरुषों के जीवन कार्यों को याद करते हैं और उनके संदेश के अनुसार,  उनके सिद्धांतों के अनुसार हमारे जीवन में आगे चलने का और देश की सेवा करने के लिए और हमारे दिल में राष्ट्र भावना जगाने के लिए अपना  प्रयत्न करते हैं। ' दे दी हमें आजादी बिना खडक बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल ' यह जो पंक्ति है कमाल की है क्योंकि हमारे देश में ऐसे वीर पुरुष,  ऐसे विश्व वंदनीय महान लोगों का जन्म हुआ है,  जिसको  याद हम हंमेशा करते हैं। उसके  सिद्धांत को  याद करते हैं।  गांधीजी के सिद्धांतों में सत्य, अहिंसा,  ब्रह्मचर्य,  सादगी और विश्वास था।  इसीलिए उसको याद करके हम और अक्टूबर महीने में उसके जन्म तिथि के अवसर पर उसे याद करके उसके सिद्धांतों को अनुसार कार्य करने का प्रयास करते हैं।  सत्य और अहिंसा के पुजारी ऐसे हमारे प्यारे बापू का जन्म 2 अक्टूबर 18 सो 79 में पोरबंदर में हुआ था।  उसका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था।  उसकी माता का नाम पुतलीबाई था।  बचपन में उन्होंने हरिश्चंद्र नाटक देखा था और उसमें जो श्रवण की कथा आती है और इसलिए उस पर उसका बड़ा प्रभाव पड़ा और उस दिन से उसने सत्य बोलने का और मां बाप की सेवा करने का निर्णय किया था।  सत्य के मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा की।  गांधीजी ने देश में शिक्षा पूरी करने के बाद अभ्यास के लिए विलायत भी गए और बैरिस्टर भी बने।  गांधीजी वकालत करने के लिए  दक्षिण अफ्रीका में गए और वहां  हिंदुओं के साथ हो रहा जो अन्याय हैं उसने अपने नजर के सामने देखा और रंगभेद का कड़वा अनुभव हुआ और उसने  न्याय  के लिए अहिंसक आंदोलन किए थे। उसमें  सफलता हासिल की,  उसके बाद गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आए और उस समय भारत में अंग्रेजों का शासन था। भारत को  अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करने के लिए गांधीजी ने देशव्यापी आंदोलन किया।  देश की जनता और देश के नेताओं ने  सहयोग दिया।  अंग्रेजों के सामने अहिंसक लड़ाई  से  1947 में देश को आजादी दिलाई।

    गांधीजी एक महान पुरुष थे,  वह मानवता के संरक्षक थे।  वहीं दीन दुखियों को मददगार और अहिंसा के पुजारी थे।  वह भारत की स्वतंत्रता के  महान स्वतंत्रता सेनानी थे।  वह दूसरों की पीड़ा समझने वाले महान संत थे। उसका जन्म गुजरात में हुआ था और उसके जन्मदिन को लोग गांधी जयंती के रूप में मनाते हैं। महात्मा गांधी जी विश्व के महान नेताओं में उसकी गणना होती हैं। उसके जन्मदिन के शुभ अवसर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्व दिया गया है और उसे उस दिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस  घोषित किया गया है। आज सही अर्थ में,  सही मायने में गांधीजी के जीवन मूल्यों की आवश्यकता है।  महिला और बच्चों के साथ जो अत्याचार की घटनाएं घटती हैं और धर्म और संप्रदाय के नाम पर जो जहर फैलता है इस बीच में आज गांधी के विचारों से  दुनिया में शांति लाने की आवश्यकता है।  गांधीजी के विचार ही देश में शांति के वाहक बनकर शांति ला सकते हैं।  गांधीजी देश की आजादी के लिए अहिंसा का मार्ग पसंद किया था और सामने वाले दुश्मन को हराने के लिए हिंसा नहीं मगर अहिंसा का मार्ग अपनाना था।  गांधीजी ने विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया था और स्वदेशी वस्तु को अपनाने के लिए जोर दिया था और अपने देश में नौजवानों को रोजगार मिल सके ऐसा प्रयत्न भी गांधीजी ने किए थे।  गांधीजी के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि सत्य और अहिंसा के मार्ग पर आगे चलना चाहिए और सादा जीवन और सात्विक जीवन ही जीना चाहिए।

    गांधीजी के जीवन पर से हमें यह सुबोध मिलता है कि जिस देश में हजारों लाखों लोग भूखे मरते हो उस देश के पास कोई  धर्म कला के साथ कोई संगठन या कोई संप्रदाय नहीं होता।  अहिंसा शक्ति हिंसा से श्रेष्ठ हैं और स्वच्छता पवित्रता और आत्म सम्मान से जीना चाहिए।  जीवन में त्याग की भावना रखनी चाहिए।  गुलाब और अगरबत्ती को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह अपने आप अपनी सुगंध  फैलाती  हैं और व्यक्ति शुद्ध आचरण और सत्य का आग्रही होना चाहिए।  उन पर लोग विश्वास करते हैं , इसका लोग आदर करते हैं ,  सत्कार करते हैं। 

    गांधीजी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में कहां हैं और उस बात का जिक्र किया है और साथ में उसे स्वीकारा भी हैं कि हमारे जीवन में अपनी आवश्यकता के अनुसार ही चीज वस्तु का संग्रह करना चाहिए। आवश्यकता से ज्यादा संग्रह करना भी हिंसा ही है और इसीलिए ही बहती हुई साबरमती से मात्र एक लोटा पानी लेने वाले महात्मा गांधी ऐसे ही महात्मा नहीं बने थे।  ऐसो आराम से  दूर रहते थे  और एक ही धोती के आधार पर सत्य और अहिंसा के लिए अपना जीवन खर्च करने वाले व्हाले  और प्यारे बापू को कोटि-कोटि वंदन। 1915 में  साबरमती नदी के किनारे आश्रम की स्थापना की थी और वह सादगी से रहते थे। कितना  भी काम क्यों ना हो ! वह  सुबह -शाम प्रार्थना जरूर करते थे और प्रार्थना में आने वाले लोगों से वह मिलते थे। अपना प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए यह कवि नरसिंहज  का जो भजन है उसे अति प्रिय था।  वह रोज हर समय अपना ए प्रार्थना का समय निकालकर प्रार्थना करते थे और कहते थे जीवन में प्रार्थना का बहुत ही महत्व है। उसकी पत्नी का नाम था कस्तूरबा। अपनी पत्नी ने उसको  बहुत ही सहकार दिया था और 30 जनवरी 1948 को गांधीजी दिल्ली में प्रार्थना सभा में जा रहे थे,  तो उस समय उसे  गोली से मार दिया गया और इसलिए पूरे विश्व भर में एक   ऐसा सदमा लगा की  मानो  देश मर गया हो ,ऐसा लग रहा था।  आज उसकी जो समाधि है वह दिल्ली में है जिस को  राजघाट के नाम से जाना जाता है।  भारतवर्ष के लोग गांधी जी को राष्ट्रपिता के रूप में जानते हैं।  और उसे याद करते हैं।  अंत में कह सकते हैं कि ' वैष्णव जन तो उसे कहिए जे पीर पराई जाने रे '।


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