गुरु की महिमा - Guru Purnima

   

        महाकवि कालिदास ने कहा है की " भारतीय जना उत्सव प्रिया "सही बात है क्योकि हमारे देश में साल में जितने दिन नहीं है उससे ज्यादा त्यौहार है। उसका प्रमुख कारण हमारे देश के उत्सव प्रिय और धर्म प्रिय लोग है।
        संसार में माता-पिता ,भाई-बहन और पति - पत्नी जैसे संबंध है तो साथ में गुरु और शिष्य जैसे आदर्श और पवित्र संबंध भी है। 
                                                                    
        भारत में पौराणिक समय से गुरु परंपरा प्रचलित है। इसलिए गुरु पूर्णिमा का त्यौहार बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है।  यह त्यौहार गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का बड़ा और शुभ अवसर माना  जाता है।
        गुरु किसी भी समाज, संस्कृति और युग में हंमेशा सम्मानीय और पूजनीय रहे है।  इसलिए कबीर ने कहा है की
                  
                   " गुरु गोविन्द दोऊ  खड़े, काके  लागू  पांय।
                     बलिहारी गुरु आपने  गोविन्द दियो बताय ।। "

        मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज /परिवार में रहता है।  इसलिए जीवन में कई प्रकार की समस्याऍ और प्रश्नो होते है।
        वह प्रश्नो का समाधान समाज के संत - महात्मा और मार्गदर्शक बनकर जो रास्ता दिखते है वह हमारे गुरु है।
        गुरु में शिक्षा या ज्ञान लेकर मनुष्य भविष्य में महान बनता है।  जीवन को सार्थक बनाते है।  गुरु के विभिन्न स्वरूप होते है , जिस में  मनुष्य के रूप में और प्रकृति के रूप मे भी हमें मार्गदर्शन मिलता है।
        गुरु की भाषा में प्रेम और करुणा होती है। उस के वचन में ममत्व होता है।  गुरु की वाणी से अज्ञान का अंधकार दूर होता है।
    गुरु की करुणा भरी द्रष्टि से हमारी आत्मा पवित्र हो जाती है।  गुरु आत्मा और परमात्मा को जोड़ ने वाली कड़ी है।  गुरु , शिष्य में संस्कारो का सिंचन करके दुनिया को देखने की द्रष्टि देते है।

        किसी ने कहा है की " जन्म माता - पिता को आभारी है किन्तु जीवन तो गुरु को ही आभारी है। "
        गुरु हमारी शारीरिक और मानसिक पीड़ा को दूर करते है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए गुरु के आशीर्वाद  जरुरी है। जीवन के लिए श्वास की आवश्यकता है उसी प्रकार जीवन कल्याण के लिए  गुरु अनिवार्य है।  हम कह सकते है की गुरु हमें शिक्षा और दीक्षा देते है , इसीलिए सतगुरु के हाथ पकड़कर चलेंगे तो दुनिया में दुसरो के पैर पकड़ने की जरूरत नही होंगी।


गुरु के चरण में मेरा  कोटि कोटि वंदन।

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