हमारे
देश में वर्ष में अनेक प्रकार के त्यौहार आते हैं जिसमें अलग-अलग प्रकार
के जाति धर्म के अलग-अलग त्यौहार होते हैं और उसमें भी खास करके विक्रम
संवत के वर्ष में दो ऐसे त्यौहार हैं जिसका हमारी भारतीय संस्कृति के साथ
पवित्र नाता है और वह हमारी भारतीय संस्कृति के पवित्र निर्मल और निस्वार्थ
प्रेम के प्रतीक हैं और वह है रक्षाबंधन और भाई बीज का त्यौहार हमारा समाज
कई ऐसे अटूट संबंधों से बंधा हुआ है। जिसके अनेक संबंध है और वह है माता
पिता, पति पत्नी ,भाई बहन। रक्षाबंधन का त्यौहार भाई और बहन के पवित्र और
निर्मल प्रेम का प्रतीक माना जाता है। रक्षाबंधन का त्यौहार नारी सम्मान का
त्योहार है हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि जहां नारी का सम्मान होता है
वहां ईश्वर का निवास होता है और वही ईश्वर खुश होते हैं और जहां नारी का
सम्मान नहीं होता वहां सर्व कार्य असफल होते है|

रक्षाबंधन
का त्यौहार सावन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है वैसे भी सावन का
महीना वर्षा ऋतु का महीना होता है और सबसे ज्यादा त्योहार उसी महीने में
आता है सावन मास में वर्षा के कारण चारों ओर हरियाली ही हरियाली होती है और
पूरा माहौल हरीतिमा से भर जाता है और खुशनुमा माहौल होता है और वातावरण
आह्लादित हो बनते हैं और हमारा देश कृषि प्रधान देश है इसलिए हमारे देश के
किसान भी खुश खुश नजर आते हैं और धरती ने नया रूप धारण कर लिया होता है
मानो सृष्टि का नया जन्म हो ऐसा हमें लगता है।
श्रावणी पूर्णिमा के दिन बहन भाई के हाथ में रक्षासूत्र बांधकर भाई के लिए अखंड सुख और समृद्धि की प्रार्थना करती है। बदले में, भाई किसी भी मुश्किल समय में बहन की मदद करने और जीवन के लिए हर बुराई के खिलाफ उसकी रक्षा करने का वादा करता है। इसी समय, प्यार का प्रतीकस्वरूप बहन को उपहार देता है।
इतिहास में इस त्योहार के बारे में कई मिथक हैं। किंवदंतियों में से एक इस प्रकार है।

जब भगवान विष्णु ने बढ़ती राक्षसी शक्ति की पीड़ा से पृथ्वी को मुक्त करने के इरादे से एक वामन (बौने) का रूप धारण किया। राजा के एक यज्ञ के दौरान, वामन उसके पास पहुंचे और बाली ने कहा जो भी वह
मांगे उन्हें मिलेगा। वामन ने तीन पग भूमि माँगी। बाली सहमत हो गया और बौने
ने अपना आकार बदलकर विशालकाय कर लिया। उन्होंने अपनी पहली कदम स्वर्ग पर
रखा, और दूसरा नर्क में। बाली ने महसूस किया कि वामन विष्णु अवतार थे।
सम्मान में, राजा ने वामन को अपना पैर रखने के लिए तीसरे स्थान के रूप में
अपना सिर पेश किया। उन्होंने अपना तीसरा कदम बाली के सिर पर रखा और अमरता
प्रदान की। और उन्ह असुरों की पीड़ा से पृथ्वी को मुक्त करते हुए रसातल(पाताल ) में भेज दिया। बदले में, जब भगवान ने बलिराज से वरदान माँगने के लिए कहा, तो बलिराज ने भगवान से द्वारपाल के रूप में हमेशा के लिए रसातल में उसके साथ रहने का वरदान माँगा।
इस प्रकार, जब बलिराज ने वैकुंठ से भगवान विष्णु को रसातल में बुलाया, तो माता लक्ष्मीजी भ्रमित हो गईं। उन्होंने इस परेशानी से छुटकारा पाने के लिए श्रावणी पूनम के दिन बलिराज को राखी बाँधी। और बदले में बलिराज से भगवान विष्णु को में छुड़ाने की माँग की। तब तीनों देवताओं ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक तरीका तैयार किया कि बलिराज को वरदान के रूप में दिया गया वचन नहीं तोड़ा जाएगा और लक्ष्मीजी की इच्छा भी पूरी होगी। और तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने द्वारपाल बनने का प्रण लिया। यह परंपरा जारी है। जिसके अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु रसातल में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी के दिन वह रसातल से बाहर आते हैं और लक्ष्मीजी के पास वैकुंठलोक जाते हैं। और भगवान शंकर बलिराज के संरक्षक के रूप में रसातल में चले जाते हैं। जो महाशिवरात्रि के दिन रसातल से निकलते है और ब्रह्माजी रसातल में चले जाते हैं। जो देवउठनी एकादशी के दिन रसातल से निकलते है।
इस प्रकार, रक्षाबंधन के उपहार के रूप में, दैत्यराज बलिराज ने लक्ष्मीजी को अपनी बहन माना और भगवान विष्णु को स्थायी बंधन से मुक्त किया।
रक्षाबंधन के पर्व के पीछे अनेक ऐतिहासिक और सामाजिक घटनाएं और प्रसंग हमें मिलते हैं जो इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों से लिखे गए हैं और उसमें जो कहानी है वह मुगल बादशाह हुमायूं और राजपूत रानी कर्णावती की कथा मशहूर है जिसमें कर्णावती ने हुमायूं को अपने धर्म का भाई माना था और हुमायूं ने जाति धर्म के भेद को छोड़ कर भूल कर अपनी बहन की रक्षा की थी यही हमारा धर्म है यही हमारी धरोहर है रक्षाबंधन के पीछे अनेक पौराणिक कथाएं भी हैं पांडव और कौरव के युद्ध के समय अभिमन्यु की रक्षा हेतु माता कुंती ने उसकी रजा रक्षा के लिए और उसकी विजय के लिए उसे राखी का धागा बांधकर ईश्वर से प्रार्थना की थी। हमारे समाज के कई लोग इस रक्षाबंधन के दिन को नारियल पूर्णिमा के रूप में भी मनाते हैं और इसी दिन नाविक और उसका परिवार साथ मिलकर वरुण देव की पूजा अर्चना करते हैं और समुद्र को अपना आराध्य देव मानकर उसकी आराधना करते हैं और अपने भविष्य की सफर का शुभारंभ करते हैं। रक्षाबंधन के दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर तिलक करके उसकी कलाई पर प्यार से प्रेम से मोहब्बत से राखी बाँधती है और उसको मिठाई खिलाती हैं और अपने भाई की लंबी उम्र के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं। भाई भी अपनी बहन को कुछ भेज देता है और साथ में आशीर्वाद देता है और अपने ह्रदय से दुआ करता है कि तू जहां भी रहे वहां मेरी दुआओं की छांव हो वह शहर हो फिर चाहे गांव हो तेरी आंखों में कभी कोई गम ना हो बस यही दुआ है हमारी कि तेरी खुशियां कभी कम ना हो।
रक्षाबंधन का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है सभी धर्म के लोग हिल मिलकर प्रेम से एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और रक्षाबंधन के दिन बहन अपने भाई को खुशी होने की कामना करती हैं और कहती हैं कि भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना और कहती हैं कि तुम्हारे विचारों को सदविचारो मे परिवर्तन करना अंत में ऐसा कहा जाता है की
फूलों की तरह महकते रहो ,सितारों की तरह चमकते रहो।
किस्मत से मिले हैं यह भाई बहन के रिश्ते खुद भी हंसो और बहनों को भी हंसाते रहो।
तो हम कह सकते हैं कि जिंदगी का अर्थ क्या है मैंने ऊपर बताया था कि हमारा समाज कहीं रिश्तो से कई बंधनों से बंधा हुआ है जिंदगी में हम चार धाम की यात्रा कहते हैं और यही यात्रा यह हमारे पवित्र रिश्ते हैं जिसमें पहला रिश्ता है
मां की गोद
पत्नी का प्यार
बेटी का स्मित और
बहन की राखी
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