बेटी बचाओ

 

  
भारतीय संस्कृति के समाज जीवन में बेटी का स्थान अलग है , बेटी परिवार का अलंकार है | माँ ममता की मूरत है , पिता वात्सल्य की मूरत है  तो बेटी करुणा का सागर है | बेटी एक ऐसा पात्र है जिसके ह्र्दय में हर व्यक्ति के लिए के मान और सम्मान और प्रेम और प्यार पनपता है | बेटी शब्द एक पवित्र है , हमारी भारतीय संस्कृति में समर्पण और त्याग की भावना है , तो  उसमे बेटी त्याग की मूरत है ,बेटी दया की देवी है और वह प्यार का समंदर है  और स्नेह की सरिता है | फिर भी हमारे समाज में बेटी और बेटे को अलग स्थान दिया  गया है और उसके साथ अन्याय किया गया है |


    बेटी पराया धन मानी जाती है किन्तु पराए को अपना बनाने की कला ईश्वर ने  उसे भी दी  है | परंपरा और रिवाजो को मान कर बेटी को पाल पोस  कर बड़ा किया जाता है , पर समय पर उसे हमारा मन मना कर ह्रदय को कठोर बना कर बिदा करनी पड़ती है | बेटी आकाश में उड़ता हुआ आजाद बंसी है|  वह अपने कौशल्य और शिक्षण से परिवार को संवार सकती है और अपने माँ-बाप का नाम रोशन कर सकती है , मगर आज अफ़सोस की बात यह है कि हमारे समाज में बेटी के जन्म के अवसर पर दुःख का अनुभव किया जाता है  और उसके लालन - पालन में भेदभाव रखा जाता है बेटी को परिवार का बोझ माना जाता है और उसे ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता |

    14 वी  और 15 वी  शताब्दी में बेटी दहेज प्रथा , सती प्रथा और 'दूध पीती' प्रथा जैसी कुरीतियों से जोड़ा गया है | परिस्थियाँ और समय बदल गए हैं लेकिन बेटियों के प्रति नफरत 21 वी सदी में भी नहीं बदली है | हम सभ्य और आधुनिक हो गए लेकिन बेटी को जन्म देने का अधिकार छीन लिया गया है और कन्या भ्रूण को गर्भ में ही मार दिया जाता है | 



    " कन्या भ्रूण हत्या " सभी मानव जाती का अपमान है | अगर भ्रूण हत्या की प्रथा इसी तरह जारी रही , तो बलात्कार जैसे यौन अपराध बढ़ेंगे, महिलाओं की सुरक्षा घटेंगी और लड़कियों की तस्करी होने लगेंगी | क्या हम महिलाओं के बिना दुनिया की कल्पना कर सकते है ? इसलिए कन्या भ्रूण हत्या को रोकना चाहिए |

    बेटी ऐसी पूंजी है भले ही आप इसे पराई पूंजी मानते हों लेकिन , वह अपने माता-पिता के प्यार और उनके प्रति अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलती | उसमे इतनी आत्मीयता और साहस है की शादी के बाद भी जरूर पड़ने पर वह अपने ससुराल के साथ साथ अपने माता-पिता को भी रख सकती है | बेटी पिता के लिए दिल की धड़कन है | यहाँ तक कि एक आदमी जो अपने जीवन में नहीं रोया है वह बहुत रोता है जब वह अपनी बेटी को एक पिता के रूप में विदाई देता है | बेटी कभी delete  न होने वाली  और हमेशा refresh रहने वाली लागणी है | वह बचपन से ही अपनी जवाबदारी निभाती है  |


    बेटी बनकर आई थी माँ बाप के जीवन में ,कब बड़ी हो गई पता नहीं चला के शैशव के आँगन में खेलते खेलते यौवन की चौखट कब पार  कर गई पता नहीं चला, अब तो बसेरा होगा कल किसी और के आँगन में | 
 

 

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